संथालियों के धार्मिक धरोहर लुगुबुरु पहाड़ पर नहीं लगेगा हाइडल प्लांट, सीएम ने दिया भरोसा


बोकारो : संथालियों के धार्मिक धरोहर लुगुबुरु पहाड़ पर डीवीसी का प्रस्तावित हाइडल पावर प्लांट नहीं लगेगा। संथाली आदिवासियों को ये भरोसा झारखंड के सीएम हेमेंत सोरेन ने दिया। बता दें कि इस समय वे संथाली समुदाय के सरना अंतरराष्ट्रीय महासम्मेलन में भाग लेने के लिए ललपनिया के लुगुबुरु, लुगुबुरु घंटाबाड़ी गये हुए हैं। उनके साथ उनकी पत्नी कल्पना सोरेन और डुमरी की विधायक बेबी देवी भी मौजूद हैं। सीएम ने इस दौरान लुगुबुरु घंटाबाड़ी में आदिवासियों के आराध्य देवता मरांग बुरु का नमन किया और अन्य जनजातीय अनुष्ठानों में शिरकत की। इस दौरान लुगुबुरु पहाड़ के इर्दगिर्द सुरक्षा के कड़ा इंतेजाम किये गये थे। 


देश के हर कोने से आते हैं आदिवासी 

बता दें कि झारखंड के बोकारो, ललपनिया में संथालियों के धर्म महासम्मेलन का आगाज हो गया है। यह महासम्मेलन लुगुबुरु घंटाबाड़ी में आयोजित हो रहा है। संथाली आदिवासियों के लिए इस स्थान यानी लुगुबुरु घंटाबाड़ी का विशेष महत्व है। इसलिए यहां देश और देश के बाहर से भी संथाली आदिवासी प्रकृति में अपनी आस्था प्रकट करने साल में एक बार जरूर आते हैं। संथाली आदिवासियों के हर विधि-विधान और अनुष्ठान के बीच लुगुबुरु घंटाबाड़ी का जिक्र किसी न किसी रूप में जरूर आता है। इसी से इस स्थान की महत्ता को समझा जा सकता है। दूसरे शब्दों में लुगुबुरु घंटाबाड़ी संथाली आदिवासियों की परंपरा और संस्कृति का आगाज स्थल है। संथाली ऐसा मानते हैं कि लुगु बाबा की अगुवाई में लुगुबुरु घंटाबाड़ी में ही उनके संथाली संविधान और रीति-रिवाजों की रचना हुई। इसमें जन्म से लेकर मृत्य तक के अनुष्ठान और मान्यताएं शामिल हैं।  

12 साल तक लगातार धर्म बैठक
लुगुबुरु घंटाबाड़ी के बारे में कहा जाता है कि यहां लाखों साल पहले लुगुबुरु की अगुवाई में संथाली समुदाय ने 12 साल तक लगातार बैठक की। इसी के संकेत में एक संथाली लोकगीत में गेलबार सिइंया, गेलबार इंदा यानी 12 दिन, 12 रात की चर्चा की जाती है। मान्यता है कि संथालियों के गौरवमयी इतिहास की शुरुआत इसी बाद शुरू हुई। संथाली परंपरा और संस्कृति की रचना की गयी। बैठक में लगभग एक युग अथवा दशक के दौरान संथालियों ने इसी स्थान पर पहली बार फसल बोया। अन्न उपजाये और धान कूटने के लिए पहली बार इसी स्थान पर चट्टानों का इस्तेमाल किया गया। इसके चिह्न आज भी यहां यानी लुगुबुरु घंटाबाड़ी में देखे जा सकते हैं। 

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