रांची: झारखंड में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए मनरेगा योजना को लेकर महत्वपूर्ण चुनौती आई है। पिछले चार सालों में यह योजना ग्रामीण परिवारों की रीढ़ के रूप में सामने आई है, लेकिन इसकी प्रभावी निष्पादन में अभी भी कमी है।
योजना के अंतर्गत प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ग्रामीण परिवारों के वयस्क सदस्यों को 100 दिनों का रोजगार देना है, लेकिन इस साल की सालाना रिपोर्ट में दर्ज है कि इसमें भी कमी आई है। चालू वित्त वर्ष में केवल 60,591 परिवारों को ही दिसंबर तक 100 दिनों का रोजगार मिल सका है।
जुलाई महीने में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झारखंड राज्य ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना परिषद की बैठक में मनरेगा के तहत जिला कार्यक्रम समन्वयक की जिम्मेवारी जिलों के उपायुक्तों को देने के प्रस्ताव पर सहमति जतायी थी। इससे पूर्व उप विकास आयुक्तों के पास मनरेगा की जिम्मेवारी हुआ करती थी, लेकिन उपायुक्तों को कार्यक्रम समन्वयक बनाये जाने के बाद से से दिनों से मनरेगा से रोजगार सृजन के मामले कम हो रहे हैं।
अप्रैल महीने में 1 करोड़ 25 लाख 15 हजार 193 मानव दिवस रोजगार सृजन हुए, जिसमें से केवल 8 लाख 20 हजार 192 परिवारों को रोजगार मिल सका, जो दिसंबर महीने में 39 लाख 59 हजार 915 हो गया। इसमें मात्र 4 लाख 09 हजार 629 परिवारों को ही रोजगार मिल सका।
यह स्थिति दर्शाती है कि मनरेगा योजना के तहत ग्रामीणों को अभी भी वांछित रोजगार नहीं मिल पा रहा है।
